फिर से लेकिन वो मसीहा खो न जाये देखना..!
आज जो अपना है कल वो खो न जाये देखना,
जिसका डर है हादसा फिर हो न जाये देखना.!
हमने कुछ विश्वास के,,, पौधे लगाये थे जहां
कोई शंकाओं के कांटे,, बो न जाये देखना....!
आजकल तालाब क्या नदियाँ भी गन्दी हो गयीं
बादलों का जल भी मैला,,, हो न जाये देखना...!
हमने हँसते खेलते,,,,,, आंसू छुपाए हैं सदा
सोचकर इस दर्द को वो रो न जाये देखना...!!
इक सदी के बाद वो,, दीपक लिए लौटा तो है
फिर से लेकिन वो मसीहा खो न जाये देखना..!
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें